कर्म का विलय
हर प्राणी अपनी भावनाओं, आसक्तियों और अनुभवों से बनी कर्म की परतें ढोता है। जागृत कुंडलिनी भीतर की ओर मुड़ती है और क्रियाओं के माध्यम से इन संस्कारों को विलीन करती है: अनैच्छिक गतियाँ, श्वास, ध्वनियाँ, अश्रु, दर्शन। माया का आवरण क्षीण होने लगता है।
















